रविवार, 7 मार्च 2010

सार्थक सृजन ( मार्च 2010 )







सम्पादकीय

‘सार्थक सृजन’ को अच्छे पाठक और सशक्त रचनाकार मिले, यह गौरव की बात है। पिछ्ले अंकों को पढ़कर सार्थक टिप्पणियों के लिए सुधी पाठकों का आभारी हूँ कि उन्होंने बेबाक टिप्पणियाँ देकर जो साझेदारी की है, उससे रचनात्मकता को बल मिला है। अभी तक सभी रचनाकारों ने अपनी सहज स्वीकृति प्रदान कर सार्थक सृजन का मान बढ़ाया है और इस प्रकार उनके रचनात्मक सहयोग के लिए हम आभारी हैं।
इस बार के दोनों ही रचनाकार चर्चित और वरिष्ठ हैं, बहुआयामी रचना-संसार का सृजन इन रचनाकारों की पहचान है।
आज का वातावरण विध्वंस की दुर्गंध से भरा पड़ा है जिसने अविश्वास और अमानवीयता का वातावरण तैयार किया है। सृजन की अनुभूति सहज ही इसके विरोध में खड़ी होती रही है और समूची मानवता के प्रति आशा और विश्वास को जगाती रही है। ऐसी ही संवेदना से परिपूर्ण रचनाएं पाकर आप निश्चित रूप से सुखद अनुभूति से भर उठेंगे। माध्यम चाहे कविता हो या कहानी, महत्वपूर्ण होती है संवेदना और उसका रचनात्मक नज़रिया। रचना यदि सहज संप्रेषित है तो सभी विधाओं का लक्ष्य मानवीय संवेदना की ओर ही मुड़ता है और यही रचना का महत्वपूर्ण उद्देश्य होता है। आप सभी को यह पोस्ट सौंपते हुए आपकी सक्रिय भागीदारी की कामना करता हूँ।
सुरेश यादव
सम्पादक – ‘सार्थक सृजन’

कविताएँ

सत्य नारायण हिंदी साहित्य जगत में एक ऐसा जाना-माना नाम है जिन्होंने जनता से अपनी रचनाओं के माध्यम से हमेशा ही सीधा सम्वाद किया है। अपने गीतों, नवगीतों, कविताओं को लेकर इनके अनेक संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं जिनमें ‘सभाध्यक्ष हँस रहा है’ और ‘टूटते जलबिंब’ बहुत ही प्रसिद्ध नवगीत संग्रह हैं। इनकी नुक्कड़ कविता और गीत कविता के सम्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका है। ‘बिहार राष्ट्र्भाषा परिषद’ के विशिष्ट साहित्य सेवा सम्मान एवं गोपाल सिंह नेपाली पुरस्कार से सम्मानित।

बच्चों पर केन्द्रित चार कविताएँ
-सत्य नारायण

बच्चे-1

बच्चे
जैसे कथा-कहानी !

परी-देस के
स्वप्न सरीखे
दीखे, खुल-खिल
हंसते दीखे

ऊपर झिलमिल
चांद -सितारे
नीचे कल-कल
बहता पानी !

इनकी तुतली-
तुतली भाषा
मेवा-मिसरी
दूध-बतासा

कांच रबड़ के
खेल-खिलौने
गुड्डे-गुड़िया
राजा-रानी !

छंद गीत के
बहर गजल की
आहट
आने वाले कल की

सोच-समझ
से भी बढ़कर है
इन मासूमो
की कहानी !
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बच्चे-2

बच्चे
अक्सर चुप रहते हैं!

कौन चुराकर
ले जाता है
इनके होंठों की फुलझड़ियां

बिखरी-बिखरी-सी
लगतीं क्यों
मानिक-मोती की ये लड़ियां

इनकी डरी-डरी-आंखों में
किन दहशत के
नाम-पते हैं ?

जाने कहां
गवां आए ये
चपल चौकड़ी सोन हिरन की

घर-आंगन से
रूठ गई क्यों
नन्हीं थिरकन प्रात किरन की

गुमसुम-गुमसुम-से
रहकर भी, हमसे
बहुत-बहुत कहते हैं!

ये तह-दर-तह
खुल जाएंगे
पास-बिठाकर इनमें झांकें

इस संवेदनहीन समय में
इन पर
कोई कलरव टांकें

तनिक चूमकर देखें
कैसे सात सुरों में
ये बजते है!
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बच्चे-3

नींद में भी
जागते हैं.
सो रहे बच्चे !

बिस्तरे पर ही
लौने को
समेटे ये

पास रखकर
देखिए
निश्चिंत लेटे ये

सो रहे
सपने सुनहरे
बो रहे बच्चे !

मुस्कराते
चिंहुकते हैं
होंठ हिलते हैं

नींद की
अमराइयों में
फूल खिलते हैं

कोंपलें, कलियां
तितलियां
हो रहे बच्चे!

आज
मीठी लोरियां
है नेह आँचल का

यह समय
पत्थर समय है
क्या पता कल का

नींद में भी
एक दहशत
ढो रहे बच्चे !
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बच्चा और दंगा

बच्चा नहीं जानता
शहर में दंगा क्यों हुआ
कर्फ्यू क्या होता है
तमाम दुकानों बंद क्यों हैं
लोग-बाग अपनें घरों से
निकलते क्यों नहीं
बच्चा नहीं जानता!

वह नहीं जानता
आज अखबार की सुर्खियों
में क्या है
किसने क्या बयान दिये
शोभा-यात्रा या ताजिये पर
पत्थर किसने फेंके
इधर या उधर कितने मारे गए
बच्चा नहीं जानता!

बच्चा
बस, इतना जानता है
कि अब
उसका सलीम स्कूल नहीं आता
खोंमचेवाला किशना लापता है
रामसरन और रहमत की गुमटियां
अब पास-पास नहीं हैं
पापा को देखते ही
रहीम चाचा आंखें फेर लेते हैं
मां अब पीर बाबा के मजार पर नहीं जाती
उसके लिए गंडे
और ताबीज नहीं लाती

बच्चा
बस, इतना जानता है!

वह नहीं जानता
कि शहर में एकाएक
ये अनदेखी दीवारें कैसे खड़ी हो गई
कल तक हंसते-बतियाते लोग
एकदम अजनबी कैसे हो गए
एक हादसा
एक जुनुन
हमारे रिश्ते कैसे बदल देता है
बच्चा नहीं जानता

इसे हम जानते हैं
हम!
और हम चुप रहते हैं!

हां
वह दिन भी आएगा
जब यह बच्चा इसी तरह चुप रहेगा

अपने बच्चे के सामने
और तब....?
और तब....?
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सम्पर्क :
डी ब्लॉक, बी पी सिन्हा पथ,
कदमकुआँ, पटना-800003
फोन : 093343 10250

कहानी

हिंदी के वरिष्ठ एवं सुपरिचित कथाकार, उपन्यासकार एवं अनुवादक। अब तक 40 पुस्तकें प्रकाशित जिनमें सात उपन्यास, दस कहानी संग्रह के साथ-साथ जीवनी, बाल साहित्य, यात्रा- संस्मरण, आलोचना की पुस्तकें। लिओ तालस्तॉय के अन्तिम उपन्यास “हाज़ी मुराद” का अनुवाद। लिओ तालस्तॉय के अंतरंग संसार(संस्मरण) के अनुवाद की पुस्तक, एक कहानी संग्रह “भीड़ में” शीघ्र प्रकाश्य। इन दिनों इंटरनेट पर सक्रिय। हिंदी के तीन ब्लॉग्स- ‘वातायन’, ‘रचना यात्रा’ और ‘रचना रूप’ चर्चा में हैं।
हादसा 

-रूपसिंह चन्देल


पर्यावरण के संबन्ध में उसे इंडिया इंटरनेशनल सेण्टर में वक्तव्य देना था। हारवर्ड विश्वविद्यालय से 'पर्यावरण प्रबन्धन ' की उपाधि लेकर जब एक साल पहले वह स्वदेश लौटा, सरकार के पर्यावरण विभाग ने उसकी सेवाएँ लेने के लिए कई प्रस्ताव भेजे। लेकिन स्वयं कुछ करने के उद्देश्य से उसने सरकारी प्रस्तावों पर उदासीनता दिखाई। वह जानता है कि ऐसी किसी संस्था से बँधने से उसकी स्वतंत्रोन्मुख सोच और विकास बाधित होंगे। वह स्वयं को अपने देश तक ही सीमित नहीं रखना चाहता, बावजूद इसके कि वह अपना सर्वश्रेष्ठ देश के लिए देना चाहता है।

पर्किंग से गाड़ी निकालते समय पिता ने पूछा, ''अमि, (उसका पूरा नाम अमित है ) कब तक लौट आओगे?''''दो घण्टे का सेमीनार है बाबू जी।.... नौ तो बज ही जाएँगे।'' पिता चुप रहे, लेकिन वह सोचे बिना नहीं रह सका, 'अवश्य कोई बात है, वर्ना बाबू जी उसके आने के विषय में कभी नहीं पूछते।' गेट से पहले गाड़ी रोक वह उतरा और 'कोई खास बात बाबू जी?'' पूछा।''हाँ....आं.....'' बाबू जी मंद स्वर में बोले, ''मेरा मित्र अमृत है न!..... उसकी बेटी की शादी है।...रोहिणी में....''''सेमीनार खत्म होते ही निकल आऊँगा।''
''तुम परेशान मत होना। मैं ऑटो ले लूँगा।....'' बाबू जी ने सकुचाते हुए कहा।
''कार्यक्रम आठ बजे समाप्त हो जाएगा। लोगों से बिना मिले निकल आऊँगा..... यहाँ पहुँचने में एक घण्टा तो लग ही जाएगा, लेकिन आप ऑटो के चक्कर में नहीं पड़ेंगे.....मैं आ जाऊँगा।'' उसने पिता को बॉय किया और गाड़ी स्टार्ट कर सड़क पर उतर गया।

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अमित जब हारवर्ड पढ़ने गया था, माँ जीवित थीं। पिता रेल मंत्रालय से निदेशक पद से अवकाश प्राप्त कर चुके थे। माँ-बाप का वह इकलौता बेटा था। उन लोगों ने कभी अपनी इच्छाएँ उस पर नहीं थोंपीं, लेकिन उसने भी उन्हें कभी निराश नहीं किया। हारवर्ड जाने के एक वर्ष बाद ही माँ का निधन हो गया। पिता अकेले रह गये। पटेल नगर के तीन सौ वर्ग गज के उस मकान में नितांत एकाकी। उसने वापस लौटने की इच्छा व्यक्त की, लेकिन पता ने पहली बार उसे सख्त आदेश सुनाया, ''मेरे लिए लौटने की बात तुम्हारे दिमाग में आयी कैसे अमि.... अपनी शिक्षा पूरी करो।... '' कुछ देर तक चुप रहे थे बाबू जी और वह सिर झुकाए उनके सामने बैठा रहा था। तब वह माँ के दसवें पर आया था।

''तुम्हें दूसरों से कुछ अलग करना चाहिए।....अलग बनना चाहिए। मेरे लिए अगले दस वर्षों तक तुम्हें सोचने की आवश्यकता नहीं है। नौकरी से अवकाश ग्रहण किया है।... शरीर और मन से नहीं। वंदना।...तुम्हारी माँ थी तो अधिक बल था, लेकिन।...'' पिता फिर चुप हो गए थे। अतीत में खो गए थे वह। कुछ देर की चुप्पी के बाद वह धीमे स्वर में फिर बोले, ''तुम्हें कुछ ऐसा करना है, जिससे देश-समाज....देशान्तर को लााभ पहुँचे।....नौकरी सभी कर लेते हैं, लेकिन दुनिया उससे आगे भी है.....''

अमित चुपचाप पिता की ओर देखता रहा था।

पढ़ाई समाप्त कर लौटने के बाद पिता ने केवल एक बार पूछा, ''क्या करना चाहते हो?''

''फिलहाल नौकरी नहीं।...अपना कुछ करने के विषय में सोच रहा हूँ।''

''अपना।....?''

''पर्यावरण सम्बन्धी एक संस्था स्थापित करना चाहता हूँ.......''

''हुँह ।'' कुछ देर की चुप्पी के बाद।....कुछ सोचते हुए पिता बोले, ''अच्छा विचार है।''

संस्था को लेकर उसने देश के पर्यावरणविदों से सलाह करना प्रारंभ कर दिया। इसके परिणामस्वरूप सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं ने पहले उसे अपने सेमीनारों में श्रोता के रूप में, फिर वक्ता के रूप में बुलाना प्रारंभ कर दिया था ।

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सेमीनार खत्म होते ही वह निकलने लगा। चाहता था कि कोई उसे देखे, टोके-रोके, उससे पहले ही वह गाड़ी में जा बैठे, लेकिन वैसा हुआ नहीं। वह हाल से बाहर निकला ही था कि सामने दिल्ली के प्रसिध्द पर्यावरणविद डॉ. मुरलीधरन टकरा गए।

''क्या खूब बोलते हो नौजवान!'' पकी दाढ़ी और सफेद बोलों में स्पष्ट वैज्ञाानिक दिखनेवाले मुरलीधरन बोले, डॉ. सुनीता नारायण को तुम जैसे युवकों से परामर्श लेना चाहिए। ''

''सर, वह बहुत विद्वान हैं।.... विश्व में उनकी पहचान है। मैं तो अभी।...''

''यही न कि अभी कम उम्र - कम अनुभवी हो!'' ठठाकर हंसे मुरीधरन तो वह संकुचित हो उठा।

दोनों देर तक चुप रहे। अंतत: कुछ सोचकर, शायद यह भांपकर कि उसे चलने की जल्दी है, मुरलीधरन बोले, ''ओ। के। यंगमैन, हम फिर मिलेंगें। ''

''जी सर।'' वह गाड़ी की ओर बढ़ा यह सोचते हुए कि अनुभवी लोग चेहरे से ही अनुमान लगा लेते हैं कि कोई क्या सोच रहा है।'

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वह सामान्य गति से गाड़ी चला रहा था। कभी तेज गाड़ी चलाता भी नहीं वह। दिल्ली की सड़कें और ट्रैफिक की अराजकता।.... वह पैंतालीस-पचास तो कहीं -कहीं बीस-तीस की गति से चला रहा था। तालकटोरा स्टेडियम के पास गोल चक्कर पर टै्रफिक कुछ अधिक था। उसकी गाड़ी रेंग-सी रही थी। तभी उसके बगल में हट्टा -कट्टा लगभग बत्तीस वर्ष के युवक ने अपनी पल्सर रोकी और चीखता हुआ बोला, ''गाड़ी चलानी नहीं आती? गाड़ी (मोटरसाइकिल) को टक्कर मार देता अभी।''

वह भौंचक था, क्योंकि उसकी जानकारी में कुछ हुआ ही नहीं था। उसने धीमे और सधे स्वर में, जैसा कि उसका स्वभाव था, कहा, ''टक्कर लगी तो नहीं! ''

वह कुछ समझ पाता उससे पहले ही मोटर साइकिल सवार ने मोटर साइकिल आगे बढाकर उसकी कार के आगे लगा दी। वह गोल चक्कर पारकर शंकर रोड चौराहे की ओर कुछ कदम ही आगे बढ़ा था। उसने गाड़ी रोक दी। मोटरसाइकिल सवार युवक उसकी ओर झपटा। वह कुछ समझ पाता उससे पहले ही उसने उसे गाड़ी से बाहर खींचा और फुटपाथ की ओर घसीटने लगा।

''बात क्या है।... आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?'' विरोध करता हुआ वह उसकी मजबूत पकड़ के समक्ष अपने को असहाय पा रहा था।

''तेरी माँ की।....बताता हूँ कि बात क्या है।....मादर।...के कहता है कि लगी तो नहीं।...'' युवक का झन्नाटेदार तमाचा उसके गाल पर पड़ा। वह लड़खड़ा गया। उसे चक्कर -सा आ गया। जब तक वह संभलता मोटर साइकिल सवार का दूसरा तमाचा उसके दूसरे गाल पर पड़ा।

पैदल चलने वालों की भीड़ इकट्ठा हो गयी। लेकिन कोई भी वाहन वाला नहीं रुका। भीड़ मूक दर्शक थी और मोटर साइकिल सवार युवक दरिन्दे की भांति उस पर लात-घूँसे बरसा रहा था। लगभग अधमरा कर उसने उसे छोड़ दिया और फुटपाथ से नीचे उतरकर घूरकर उसे देखने लगा। अमित फुटपाथ पर पसरा हुआ था।... निस्पंद। भीड़ में कुछ लोग अपनी राह चल पड़े थे। कुछ खड़े थे।..... लेकिन उनमें अभी भी साहस नहीं था कि वे अमित को उठा सकते, क्योंकि मोटर साइकिल सवार वहीं खड़ा था अमित को घूरता हुआ।



लगभग दस मिनट बाद उसने आँखें खोलीं और किसी प्रकार उठकर बैठा। बैठते ही उसका हाथ मोबाइल पर गया। उसका दिमाग, जो सुन्न था, अब काम करने लगा था। पिता को यह बताने के लिए कि पहुँचने में उसे कुछ देर हो जाएगी, वह उनका नम्बर मिलाने लगा। उसे नम्बर मिलाता देख मोटर साइकिल सवार झपटकर फुटपाथ पर चढ़ा और उससे मोबाइल छीनते हुए उसके जबड़े पर मारकर चीखा, ''धी के..... पुलिस को फोन करता है।....स्साले इतने से ही सबक ले।... शुक्र मना कि बच गया।...'' उसने अमित का फोन अपनी जेब के हवाले किया, मोटर साइकिल स्टार्ट की और अमित के इर्द-गिर्द खड़े लोगों को हिकारत से देखता हुआ तेज गति से शंकर रोड चौराहे की ओर मोटर साइकिल दौड़ा ले गया।



अमित फिर फुटपाथ पर लेट गया। भीड़ फुसफुसा रही थी ''अस्पताल ले जाना चाहिए....'' ''कैसा दरिन्दा था! रुई की तरह धुन डाला.....''''पुलिस को फोन करना चाहिए।''''पुलिस के लफड़े में पड़ना ठीक नहीं।''''वह कोई गुण्डा था!''''दिल्ली में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है।....''''दिल्ली गुण्डों।.......बाइकर्स के आंतक में जी रही है और पुलिस असहाय है।''''भाई पुलिस वालों के वे साले जो लगते हैं।...हफ्ता पुजाते हैं। असहाय-वसहाय कुछ नहीं है..... जिसने हफ्ता नहीं दिया..... हवालात उसके लिए है।'' एक दूसरी आवाज थी।''राम सेवक....तुम्हें गाड़ी चलानी आती है न! '' किसी ने अपने साथी से पूछा।''आती है।''''फिर हम दोनों इन्हें राममनोहर लोहिया अस्पताल ले चलते हैं।...इन्हीं की गाड़ी में।...''अमित सभी को सुन रहा था। उसने आंखें खोलीं। दो लोग उसके ऊपर झुके हुए थे। दूसरे कुछ हटकर खड़े थे।''बाबू।...हम आपको अस्पताल पहुँचा देते हैं।''अमित चुप रहा।



''हाँ, आपकी ही गाड़ी से।....''''धन्यवाद।'' अमित फुसफुसाकर बोला, ''आप लोग कष्ट न करें।...मैं ठीक हूँ।''



रामसेवक और उसका साथी एक-दूसरे के चेहरे देखते कुछ देर खड़े रहे, फिर बिड़ला मंदिर की ओर मुड़कर चले गए। दूसरे ने पहले ही जाना प्रारंभ कर दिया था।



लगभग पन्द्रह मिनट बाद अमित ने साहस बटोरा और उठ बैठा। सिर अभी भी चकरा रहा था। उसे चिन्ता हो रही थी उसकी प्रतीक्षा करते बाबू जी की। वह अपने को रोक नहीं पाया। आहिस्ता से फुटपाथ से नीचे उतरा, गाड़ी में बैठा और चल पड़ा। एक्सीलेटर, ब्रेक और क्लच पर पैर ढंग से नहीं पड़ रहे थे। फिर भी वह धीमी गति से गाड़ी चलाता रहा।



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राजेन्द्र नगर की रेड लाइट तक पहुँचने में उसे काफी समय लगा। चौराहा पार कर वह किसी पी.सी.ओ. से पिता को फोन करना चाहता था। लेकिन जैसे ही वह रेड लाइट के निकट पहुँचा, वहाँ का दृश्य देख उसे चक्कर-सा आता अनुभव हुआ। रेड लाइट से कुछ पहले बाईं ओर एक मोटर साइकिल पड़ी हुई थी और उससे कुछ दूर एक युवक के इर्द-गिर्द खड़े कई लोग पुलिस को कोस रहे थे।



उसने सड़क किनारे गाड़ी खड़ी की।.... उतरा। कुछ देर पहले अपने साथ हुआ हादसा उसके दिमाग में ताजा हो उठा, ' तो यह उस युवक का नया शिकार था।' उसने सोचा और धीमी गति से आगे बढ़ा। चोट के कारण वह तेज नहीं चल पा रहा था।



''टक्कर इतनी जबरदस्त थी।..... शुक्र है कि गाड़ी इसके ऊपर से नहीं गुजरी।'' भीड़ में कोई कह रहा था।



''किस गाड़ी ने टक्कर मारी?'' कोई पूछ रहा था।



'' ब्लू लाइन बस थी ।....मैंने देखा।....मैं उस समय उधर पेशाब कर रहा था '' कहने वाले ने हाथ उठाकर पेशाब करने की जगह की ओर इशारा किया। ''तेज आवाज हुई तो मैंने मुड़कर देखा।'' बोलने वाला क्षणभर के लिए रुका, ''बस ने टक्कर नहीं मारी भाई जान! मोटरसाइकिल इतनी तेज थी।....इतनी।... रहा होगा ये सौ से ऊपर की स्पीड में।...यही टकराया बस से और मोटर साइकिल इधर और यह उधर।...बच गया। लेकिन चोट बहुत है।''



अमित आगे बढ़ा।



''कितनी देर हुई? '' उसने एक व्यक्ति से पूछा।''यही कोई आध घण्टा।...''''आध घण्टा।...और आप लोग खड़े इसे देख रहे हैं? पुलिस को किसी ने सूचित किया?'' वह यह कह तो गया लेकिन तत्काल सोचा कि अपरिचित राहगीरों से उसे इसप्रकार नहीं बोलना चाहिए था।



अमित के प्रश्न पर मौन छा गया था। कुछ देर बाद किसी की बुदबुदाहट सुनाई दी, ''पी.सी.आर. वैन यहीं खड़ी रहती है।... आज नदारत है।''''पुलिस को फोन करके कौन मुसीबत मोल ले।'' भीड़ में कोई और बुदबुदाया।



अमित चुप रहा। वह घायल युवक के पास पहुँचा और उसे देख भोंचक रह गया। वह वही युवक था जिसने कुछ देर पहले अकारण ही बुरी तरह उसे पीटा था।



' मैं इसे अस्पताल पहुँचाऊँ? ' अमित के मन में विचार कौंधा। 'कदापि नहीं।' लेकिन तभी अंदर से एक आवाज आयी, ' अमित, तुम्हें दूसरों से कुछ अलग करना है।....अलग बनना है,' यह पिता की आवाज थी।' मैं इसे अस्पताल पहुँचाऊँगा।...राम मनोहर लोहिया अस्पताल पास में है।' उसने निर्णय कर लिया और वहाँ एकत्रित लोगों से बोला, ''आप लोग इतनी सहायता करें कि इसे उठाकर मेरी गाड़ी में पीछे की सीट पर लेटा दें। इसे अस्पताल ले जाऊँगा।''''मैं भी आपके साथ चलता हूँ।'' एक व्यक्ति बोला।''आप परेशान न हों।...केवल गाड़ी में इसे लेटा दें....बस।....''



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अस्पताल में जिस समय एमरजेंसी के सामने उसने गाड़ी रोकी मोटर साइकिल सवार को होश आ गया। उसे देख कराहते हुए वह चीखा, ''तुम.....तुम....sss '' और वह फिर बेहोश हो गया था।

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रविवार, 17 जनवरी 2010

सार्थक सृजन (जनवरी २०१०)




सम्पादकीय
सार्थक सृजन के पाठकों/रचनाकारों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें ! इस नए वर्ष में ‘सार्थक सृजन’ यह आशा करता है कि हिंदी साहित्य जगत अपनी तमाम गुटबाजियों और कमजोरियों से ऊपर उठाकर मूल्यवान साहित्य का सम्मान करेगा और उसके व्यापक प्रचार-प्रसार में सहयोग करेगा. हिंदी भाषा एवं साहित्य अपनी प्रगति के इस मुकाम पर पहुँच चुका है, जहाँ इस जिम्मेंदारी का निर्वहन अपरिहार्य हो गया है. हिंदी साहित्य का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि दस अलग अलग रचनाकार- समीक्षकों से बीस श्रेष्ठ कवियों अथवा कहानीकारों के बारे पूछा जाये तो बहुत संभव है कि उसकी संख्या बीस से बढ़कर दो सौ हो जाये. यानी "आठ कन्नोजिया नौ चूल्हे" वाली बात पूरी तरह चरितार्थ होती है. ऐसा शायद ही किसी अन्य भारतीय भाषा या विश्व भाषा में होता हो. इस सबके पीछे मेरी यही भावना है कि चाहे पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से अथवा हिंदी ब्लोगों के माध्यम से मूल्यवान साहित्य अवश्य सुधि जनों तक पहुँचना चाहिए. यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि कुछ ब्लॉग बहुत ही सार्थक प्रयास कर रहे हैं और अच्छा साहित्य सामने ला रहे हैं. सबसे ख़ुशी की बात यह है कि हिंदी साहित्य यहाँ विश्व परिवार में एक महत्वपूर्ण के रूप में दिखाई देता है. 'सार्थक सृजन' की मामूली सी पहल भी इस दिशा में यदि सहयोग करती है तो मेरे लिए गर्व की बात है. 'सार्थक सृजन' के इस अंक में सुश्री अंजना बक्षी की तीन कवितायेँ और श्री रामकुमार आत्रेय की दो लघुकथाएं प्रस्तुत कर रहे हैं. ‘सार्थक सृजन’ के इस नए वर्ष के पहले अंक में प्रस्तुत की जा रही रचनाओं में आप संवेदनाओं और विचार की ताजगी को महसूस करेंगे. आपकी बेबाक प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी.
सुरेश यादव
सम्पादक - 'सार्थक सृजन

लघुकथाएँ



समकालीन हिन्दी साहित्य में राम कुमार आत्रेय एक जाना-पहचाना नाम है। इनके चार कविता संग्रह ‘बुझी मशालों का जुलूस’(1987), ‘बूढ़ी होती बच्ची’(1992), ‘आँधियों के खिलाफ’ तथा ‘रास्ता बदलता ईश्वर’, तीन लघुकथा संग्रह - इक्कीस जूते(1993), आँखों वाले अंधे(2000), छोटी सी बात(2007), एक कहानी-संग्रह व तीन बालकथा-संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं। सम्प्रति: हरियाणा सरकार के शिक्षा-विभाग से सेवानिवृत्त।
सम्पादक –‘सार्थक सृजन’


रामकुमार आत्रेय की दो लघुकथाएँ

पिताजी सीरियस हैं

वृद्ध पिता की आँखों की रोशनी लगभग जा चुकी थी। किसी अन्य व्यक्ति को साथ लिए बिना वह कहीं बाहर नहीं जा सकता था। डॉक्टरों ने भयंकर इंफेक्शन को मिटाने के लिए कई बार ऑप्रेशन भी किया, पर सब-कुछ निष्फल रहा। उसके एकमात्र पुत्र को भी कई दिनों तक पिता के साथ अस्पताल में रहना पड़ा था। इसके पश्चात प्रत्येक पन्द्रहवें दिन पिता को अपनी आँखें दिखाने के लिए चण्डीगढ़ जाना पड़ता था। पुत्र को उसके ऑफिस से छुट्टी न मिलने के कारण पिता को अपने किसी पड़ोसी को साथ ले जाना पड़ता। इसके लिए साथ चलने वाले का पूरा खर्च भी देना पड़ता। अनुनय-विनय भी करनी पड़ती। अहसान अलग से होता। पिता पुत्र की विवशता समझकर चुप रह जाता।
एक दिन की बात है—पिता को चण्डीगढ़ जाना था। अभी एक पड़ोसी को साथ लेकर निकलने ही वाला था कि उसे पुत्र सामने आकर पूछने लगा—“आप अभी तक गए नहीं? आठ बज चुके हैं, देर नहीं हो जाएगी क्या?”
“बस बेटा, निकल ही रहा हूँ…लेकिन आज तुम भी यहाँ हो? तुम आठ बजे से पहले ऑफिस जाने के लिए निकल जाया करते थे?” पिता ने प्रतिप्रश्न किया।
“नहीं पिताजी, आज मेरे छोटे साले का जन्मदिवस है। उसी के यहाँ जाना होगा। डाक से आया निमन्त्रण-पत्र तो आपने ही मुझे दिया था। रात उसका टेलीफोन भी आया था। रिश्तेदारी का ख्याल तो रखना ही पड़ेगा।” पुत्र ने उत्तर दिया।
“लेकिन बेटा तुम तो कह रहे थे कि तुम्हारी छुट्टियाँ ही नहीं बची हैं, तुम्हारा बॉस बहुत कड़क आदमी है? वह तो उसी ऑफिस में कार्यरत अपनी अपनी पत्नी तक को छुट्टी नहीं देता। उस बेचारी को भी सुबह नौ बजे से लेकर शाम के पाँच बजे तक मुस्तैद रहकर ड्यूटी देनी पड़ती है। लगता है आज तुम्हें विद-आउट-पे लीव लेनी पड़ी होगी?” पिता ने बात आगे बढ़ाई।
“नहीं पिताजी, विद-आउट-पे लीव नहीं ली। आज तो मैंने ऐसी चाल चली कि साला ‘न’ नहीं कर पाया।” पुत्र ने गर्व से पिता को बताया।
“ऐसी कौन-सी चाल चली तूने? मुझे भी तो बताओ बेटा।” खुश होते हुए पिता ने पूछा।
“कह दिया कि पिताजी सीरियस हैं और उन्हें चण्डीगढ़ लेकर जा रहा हूँ।” बेटे ने बताया।
पलकों से नीचे ढलक आयी आँसू की दो बूँदों को छिपाने के लिए पिताजी ने मुँह घुमा लिया।

रक्तदाता
पत्नी बीमार थी। उसे रक्त दिया जाना था। उसके लिए मैं शहर के ब्लड बैंक से रक्त खरीदने चला गया। एक बीमार-सा आदमी वहाँ पहले-से ही खड़ा था। वह बूढ़ा तो नहीं था, पर बूढ़े-जैसा लग अवश्य रहा था। चेहरे पर बढ़ी हुई दाढ़ी और आँखें बुझी-बुझी-सी थीं। कपड़े भी मैले और घिसे हुए-से पहने हुए था। ब्लड बैंक के पैथोलॉजिस्ट ने उसे देखते ही झिड़क दिया—“तुम फिर आ गए? अभी तो दस दिन भी नहीं हुए हैं जब तुम खून देकर गए थे! चलो, भागो यहाँ से।”
“नहीं बाबूजी, आज तो खून ले ही लो…पैसे की बहुत जरूरत है।” वह हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाया।
“खून तो उसी से लिया जाता है जिसके पास खून हो। अभी तुम में खून ही नहीं है। वैसे भी, मैंने पहले भी तुम्हें बता दिया था कि तीन मास बाद ही दूसरी बार खून लिया जा सकता है। फिर आना, अब जाओ।”
“जब मेरा बेटा ही मौत के मुँह में चला जायगा, तब खून देने का क्या फायदा होगा…” वह धीमे-से बुदबुदाया, जैसे उसने अपने-आप से ही कुछ कहा हो। उसकी यह बुड़बुड़ाहट मेरे साथ-साथ पैथोलॉजिस्ट को भी सुनाई दी।
“क्या मतलब?” पैथोलॉजिस्ट पूछे बिना नहीं रह पाया।
“मेरा एक ही बेटा है…वही मरने को है…उसी की दवाई के लिए पैसे चाहिए थे…” इतना कहकर वह फूट-फूटकर रोने लगा।
अब मेरे लिए वहाँ खड़ा रह पाना असम्भव था। मैं खून की दो बोतलों के लिए जो पैसे साथ में लाया था, उन्हें उसके हाथों में थमाकर ब्लड बैंक से बाहर निकल आया।
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सम्पर्क: मकान नं 864-ए/12, आज़ाद नगर, कुरुक्षेत्र-136119(हरियाणा)
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कविताएं


सुश्री अंजना बख्शी समकालीन हिन्दी कविता में एक उभरता हुआ सशक्त नाम है। इनका जन्म दमोह(मध्य प्रदेश) में 5 जुलाई 1974 में हुआ और इन्होंने एम. फिल. (हिन्दी अनुवाद), एम.सी.जे. (जनसंचार एवं पत्रकारिता) की है। देश की छोटी-बड़ी अनेक पत्र-पत्रिकाओं में इनकी कविताएं प्रकाशित हुई हैं यथा- कादम्बिनी, कथादेश, अक्षरा, जनसत्ता, राष्ट्रीय-सहारा। इसके अतिरिक्त नेपाली, तेलेगू, उर्दू, उड़िया और पंजाबी में कविताएं अनूदित। “गुलाबी रंगोंवाली वो देह” पहला कविता संग्रह वर्ष 2008 में प्रकाशित।

अंजना बख्शी की तीन कविताएं

(1)बेटियाँ

बेटियाँ रिश्तों-सी पाक होती हैं
जो बुनती हैं एक शाल
अपने संबंधों के धागे से।

बेटियाँ धान-सी होती हैं
पक जाने पर जिन्हें
कट जाना होता है जड़ से अपनी
फिर रोप दिया जाता है जिन्हें
नई ज़मीन में।

बेटियाँ मंदिर की घंटियाँ होती हैं
जो बजा करती हैं
कभी पीहर तो कभी ससुराल में।

बेटियाँ पतंगें होती हैं
जो कट जाया करती हैं अपनी ही डोर से
और हो जाती हैं परायी।

बेटियाँ टेलिस्कोप-सी होती हैं
जो दिखा देती हैं– दूर की चीज़ पास।

बेटियाँ इन्द्रधनुष-सी होती हैं, रंग-बिरंगी
करती हैं बारिश और धूप के आने का इंतजार
और बिखेर देती हैं जीवन में इन्द्रधनुषी छटा।

बेटियाँ चकरी-सी होती हैं
जो घूमती हैं अपनी ही परिधि में
चक्र-दर-चक्र चलती हैं अनवरत
बिना ग्रीस और तेल की चिकनाई लिए
मकड़जाले-सा बना लेती हैं
अपने इर्द-गिर्द एक घेरा
जिसमें फंस जाती हैं वे स्वयं ही।

बेटियाँ शीरीं-सी होती हैं
मीठी और चाशनी-सी रसदार
बेटियाँ गूँथ दी जाती हैं आटे-सी
बन जाने को गोल-गोल संबंधों की रोटियाँ
देने एक बीज को जन्म।

बेटियाँ दीये की लौ-सी होती हैं सुर्ख लाल
जो बुझ जाने पर, दे जाती हैं चारों ओर
स्याह अंधेरा और एक मौन आवाज़।

बेटियाँ मौसम की पर्यायवाची हैं
कभी सावन तो कभी भादो हो जाती हैं
कभी पतझड़-सी बेजान
और ठूँठ-सी शुष्क !

(2) अम्मा का सूप

अक्सर याद आता है
अम्मा का सूप
फटकती रहती घर के
आँगन में बैठी
कभी जौ, कभी धान
बीनती ना जाने
क्या-क्या उन गोल-गोल
राई के दानों के भीतर से
लगातार लुढ़कते जाते वे
अपने बीच के अंतराल को कम करते
अम्मा तन्मय रहती
उन्हें फटकने और बीनने में।

भीतर की आवाज़ों को
अम्मा अक्सर
अनसुना ही किया करती
चाय के कप पड़े-पड़े
ठंडे हो जाते
पर अम्मा का भारी-भरकम शरीर
भट्टी की आँच-सा तपता रहता
जाड़े में भी नहीं थकती
अम्मा निरंतर अपना काम करते-करते।

कभी बुदबुदाती
तो कभी ज़ोर-ज़ोर से
कल्लू को पुकारती
गाय भी रंभाना
शुरू कर देती अम्मा की
पुकार सुनकर।

अब अम्मा नहीं रही
रह गई है शेष
उनकी स्मृतियाँ और
अम्मा का वो आँगन
जहाँ अब न गायों का
रंभाना सुनाई देता है
ना ही अम्मा की वो
ठस्सेदार आवाज़।

(3) औरतें

औरतें –
मनाती हैं उत्सव
दीवाली, होली और छठ का
करती हैं घर भर में रोशनी
और बिखेर देती हैं कई रंगों में रंगी
खुशियों की मुस्कान
फिर, सूर्य देव से करती हैं
कामना पुत्र की लम्बी आयु के लिए।
औरतें –
मुस्कराती हैं
सास के ताने सुनकर
पति की डांट खाकर
और पड़ोसियों के उलाहनों में भी।

औरतें –
अपनी गोल-गोल
आँखों में छिपा लेती हैं
दर्द के आँसू
हृदय में तारों-सी वेदना
और जिस्म पर पड़े
निशानों की लकीरें।

औरतें –
बना लेती हैं
अपने को गाय-सा
बंध जाने को किसी खूंटे से।

औरतें –
मनाती है उत्सव
मुर्हरम का हर रोज़
खाकर कोड़े
जीवन में अपने।

औरतें –
मनाती हैं उत्सव
रखकर करवाचौथ का व्रत
पति की लम्बी उम्र के लिए
और छटपटाती हैं रात भर
अपनी ही मुक्ति के लिए।

औरतें –
मनाती हैं उत्सव
बेटों के परदेस से
लौट आने पर
और खुद भेज दी जाती हैं
वृद्धाश्रम के किसी कोने में।

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संपर्क : 207, साबरमती हॉस्टल
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गुरुवार, 26 नवंबर 2009

सार्थक सृजन (अक्तूबर- नवम्बर 2009)



सम्पादकीय
इंटरनेट पर हिन्दी साहित्य की दस्तक समकालीन साहित्य का प्रतिनिधित्व भले ही पूरी तरह न कर पा रही हो, परन्तु यह दस्तक बहुत महत्वपूर्ण है। जो लोग इसे गम्भीरता से नहीं ले रहे हैं, वे दकियानूसी खयालों से ग्रसित हैं अथवा आधुनिक तकनीक से अनभिज्ञ हैं। इंटरनेट पर आजादी जितनी अधिक है, उतनी ही आत्मसंयमता भी महसूस की जा रही है। इस दायित्व का निर्वाह करने का प्रयास ‘सार्थक सृजन’ निरन्तर करेगा और उसका यह आग्रह भी होगा कि इस कर्म में जुड़े सहकर्मी भी इस दायित्व का निर्वाह गम्भीरता से करें।
‘सार्थक सृजन’ का यह चौथा अंक विलम्ब के साथ सौंप रहा हूँ। इस विलम्ब के लिए सफाई देना ठीक नहीं। सुधी पाठकों और सृजक मित्रों ने ‘सार्थक सृजन’ को निरन्तर पढ़ा और अपनी बेबाक टिप्पणी भेजी। मैं उन सभी का हृदय से आभारी हूँ। अपनी रचनाओं के प्रकाशन के लिए स्वीकृति देने वाले और अपनी बहुमूल्य रचनाएं भेजने वाले सभी रचनाकारों का मैं विशेषरूप से आभारी हूँ।
इस अंक में वरिष्ठ हिन्दी ग़जलकार उपेन्द्र कुमार की पाँच चुनिंदा ग़ज़लें और चर्चित लघुकथाकार अशोक भाटिया की चार सशक्त लघुकथाएं प्रस्तुत हैं। सुधी पाठकों से अनुरोध है कि वे ‘सार्थक सृजन’ और इन रचनाओं पर अपनी खुली राय देकर अनुग्रहीत करें।
सुरेश यादव
सम्पादक – ‘सार्थक सृजन’